Javed Akhtar साहब
तो क्या खामोश यूँ ही डूब जाने का इरादा है?
मगर कैसे भुलाओगे
कि सूरज की उजालों से तुम्हारा कोई वादा है।
तो अब देखते क्या हो—
चलो इन कश्तियों की रस्सियाँ खोलो,
समंदर में उतरते हैं।
कहीं तो रोशनी की भी ज़मीनें होंगी,
उन्हें ढूँढने।
अगर हो सके,
तो इस अँधेरे के समंदर को पार करते हैं।
और इस कोशिश में
जीते हैं तो जीते हैं,
मरते हैं तो मरते हैं!